Meri aawaj

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Saturday, September 25, 2010

मुहब्बत का मैंने वो मक़ाम पा लिया

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मुहब्बत का मैंने वो मक़ाम पा लिया 
मिले उसको रोशनी, सो खुद को जला लिया

हम खाक है और वो है सितारों का हकदार
मिले उसको बुलंदी, सो खुद को मिटा लिया

जिन्दगी ने तोहफे में दिए कुछ फूल कुछ कांटे  
काँटों पे सोये हम, उसे फूलों पे बिठा लिया

करता भी क्या उस घर का जिस में नहीं है वो 
इसलिए "अनन्त" मैंने घर को जला दिया

-अभिषेक "अनन्त"
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5 comments:

विरेन्द्र सिंह चौहान said...

-अभिषेक "अनन्त"..जी

दिल को छू लिया आपकी रचना ने . आप बड़े अच्छे ख्यालात रखते हैं
आभार .

Sunil Kumar said...

क्या बात है खुबसूरत गज़ल बधाई

अभिषेक said...

विरेन्द्र जी और सुनील जी बहुत बहुत शुक्रिया

VIJAY KUMAR VERMA said...

मुहब्बत का मैंने वो मक़ाम पा लिया
मिले उसको रोशनी, सो खुद को जला लिया
दिल को छू लिया आपकी रचना ने .
खुबसूरत गज़ल
बधाई

mridula pradhan said...

bahot achche.