Meri aawaj
Thursday, March 17, 2016
शब्दों के नगीने जड़ा करता हूँ
Thursday, March 10, 2016
गर आईना दिखाता चेहरों के परे
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Friday, January 22, 2016
जैसा सोचो तुम वैसे हो
जैसा सोचो तुम वैसे हो,
रजकण या तारे तुम ही हो
हो सूरज का तेज तुम्ही,
निश के अंधियारे तुम ही हो
तुम ही तो रस हो नीरस में,
तुम ही काशी हो तीरथ में
मन के मारे भी हो तुम ही
तुम ही वो मन जो हो बस में
गिर के जो टूटे हो तुम्ही,
गिरतों के सहारे तुम ही हो
जैसा सोचो तुम वैसे हो,
रजकण या तारे तुम ही हो
तुम ही फूलों की माला से,
तुम ही अग्नि की ज्वाला से
गंगा जल जैसे हो तुम ही,
तुम ही सर्पों की हाला से
जीवन निर्माता हो तुम्ही,
जीवन से हारे तुम ही हो
जैसा सोचो तुम वैसे हो,
रजकण या तारे तुम ही हो
तुम ही सावन के छींटों से
तुम ही मँदिर की ईंटों से
संघर्षों की हार तुम ही
तुम संघर्षों की जीतों से
दुनियाँ कोसे वो हो तुम्ही
दुनियाँ के प्यारे तुम ही हो
जैसा सोचो तुम वैसे हो,
रजकण या तारे तुम ही हो
तुम ही तो बढते योवन हो
तुम ही तो गर्मी में वन हो
संकट सारे तुम से होते
तुम ही तो संकट मोचन हो
तूफाँ में डूबे हो तुम्ही
तूफाँ में किनारे तुम ही हो
जैसा सोचो तुम वैसे हो,
रजकण या तारे तुम ही हो
Wednesday, September 10, 2014
पहचान
जो युगों से अमिट थी पहचान ढूँढता हूँ २
देश के हर नर में श्री राम ढूँढता हूँ
सीता ढूँढता हूँ नारी के आचरण में २
मंदिरों में जाकर भगवान ढूँढता हूँ २
जो युगों से अमिट थी पहचान ढूँढता हूँ
चली थी जिस पे राधा चली थी जिस पे मीरा २
चला था बन के जोगी वो संत वो कबीरा
वो राह ढूँढता हूँ उनके निशान ढूँढता हूँ २
जो युगों से अमिट थी पहचान ढूँढता हूँ
कहाँ है मेरे गौतम कहाँ है मेरे गांधी २
सब कुछ बिखर रहा है ऐसी चली है आंधी
जो हों देश पर समर्पित अरमान ढूंढ़ता हूँ २
जो युगों से अमिट थी पहचान ढूँढता हूँ
फिर देश में बहुत से जयचंद हो गए है २
सच्चाई घुट रही है लब बंद हो गए है
शेखर भगत वो बिस्मिल वो खान ढूँढ़ता हूँ २
जो युगों से अमिट थी पहचान ढूँढता हूँ
देश के हर नर में श्री राम ढूँढता हूँ
-अभिषेक
Friday, December 13, 2013
ये दोस्त सबसे पहले तेरा नाम लिखूँगा
मैं आज अपने इस गीत के माध्यम से उन सभी दोस्तों का अभिनंदन करना चाहता हूँ जो मेरे लिये प्रेरणा और शक्ति के श्रोत हैं ।
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जो मेरी सफलता का पैगाम लिखूँगा
ये दोस्त सबसे पहले तेरा नाम लिखूँगा
जो भी बना हूँ मैं तेरा अहसान है
तूं मेरी जीत है मेरा अभिमान है
मैं हूँ सुदामा तुमको घनश्याम लिखूँगा
ये दोस्त सबसे पहले तेरा नाम लिखूँगा
जब कभी उदास था तूने हँसाया था
टूटके के फिर जुड़ना तूने सिखाया था
मेरी बुलंदी को तेरा परिणाम लिखूँगा
ये दोस्त सबसे पहले तेरा नाम लिखूँगा
जीवन की राह में जो अकेला मैं पड़ा
तूं साथ था मेरे मेरे पास है खड़ा
मैं हूँ विषाद तुमको श्री राम लिखूँगा
ये दोस्त सबसे पहले तेरा नाम लिखूँगा
जो मेरी सफलता का पैगाम लिखूँगा
ये दोस्त सबसे पहले तेरा नाम लिखूँगा
-अभिषेक
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Sunday, October 27, 2013
प्यास है घनघोर अब
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प्यास है घनघोर अब हिम को पिघलना चाहिए ।
हिंद है कुरुक्षेत्र अब अर्जुन को निकलना चाहिए ॥
हो गए है बिष भरे गद्दार बहुतों देश में ।
भीम को इन दुश्मनों के फ़न को कुचलना चाहिए ॥
हो रही है शर्मसार माँ भारती की अस्मिता ।
फिर किसी शेखर के बाजु को फडकना चाहिए ॥
हो रहा है छलकपट अब वतन के रणबांकुरों से ।
खौलके आँखों से तेरे खूं को छलकना चाहिए ॥
हो रही है जो कलंकित माँ तेरी तेजवस्विता
तूं शक्ति है अब फिर तुझे दुर्गा में बदलना चाहिए
सो रहा है एक युग से मंदिरों में बैठ कर ।
देव तुझ को फिर से मूरत से निकलना चाहिए ।।
हिंद है कुरुक्षेत्र अब अर्जुन को निकलना चाहिए ॥
-अभिषेक
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Tuesday, May 14, 2013
मैं बिलकुल तेरे जैसा हूँ
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