Meri aawaj

Meri aawaj

Sunday, October 27, 2013

प्यास है घनघोर अब



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प्यास है घनघोर अब हिम को पिघलना चाहिए ।
हिंद है कुरुक्षेत्र अब अर्जुन को निकलना चाहिए ॥

हो गए है बिष भरे गद्दार बहुतों देश में ।
भीम को इन दुश्मनों के फ़न को कुचलना चाहिए ॥

हो रही है शर्मसार माँ भारती की अस्मिता ।
फिर किसी शेखर के बाजु को फडकना चाहिए ॥

हो रहा है छलकपट अब वतन के रणबांकुरों से ।
खौलके आँखों से तेरे खूं को छलकना चाहिए ॥

हो रही है जो कलंकित माँ तेरी तेजवस्विता
तूं शक्ति है अब फिर तुझे दुर्गा में बदलना चाहिए

सो रहा है एक युग से मंदिरों में बैठ कर ।
देव तुझ को फिर से मूरत से निकलना चाहिए ।।

प्यास है घनघोर अब हिम को पिघलना चाहिए ।
हिंद है कुरुक्षेत्र अब अर्जुन को निकलना चाहिए ॥

-अभिषेक
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Tuesday, May 14, 2013

मैं बिलकुल तेरे जैसा हूँ

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जीवन की कठिन राह पर मैं  
जब हँसते हँसते चल देता हूँ    
तब सब मुझसे कहते है माँ 
मैं बिलकुल तेरे जैसा हूँ 

लोगों की कडवी बातों को मैं
जब हँसते हँसते सुन लेता हूँ
तब सब मुझसे कहते है माँ 
मैं बिलकुल तेरे जैसा हूँ

अपने हर एक दुःख में मैं 
जब छुप छुप के रो लेता हूँ 
तब सब मुझसे कहते है माँ 
मैं बिलकुल तेरे जैसा हूँ 

अपनों को और गैरों को मैं 
जब एक सा आदर देता हूँ 
तब सब मुझसे कहते है माँ 
मैं बिलकुल तेरे जैसा हूँ 

निर्धन भूखे बच्चो को मैं 
जब अपनी रोटी देता हूँ 
तब सब मुझसे कहते है माँ 
मैं बिलकुल तेरे जैसा हूँ 

जीवन के हर एक दुःख को मैं 
जब हँसते हँसते सह लेता हूँ 
तब सब मुझसे कहते है माँ 
मैं बिलकुल तेरे जैसा हूँ
हाँ बिलकुल तेरे जैसा हूँ 
माँ बिलकुल तेरे जैसा हूँ 

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Monday, April 9, 2012

ज़िंदगी ने कुछ यूँ तजुर्बे कराये हमें

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ज़िंदगी ने कुछ यूँ तजुर्बे कराये हमें ।
कुछ दोस्त दोस्त नज़र न आये हमें ।।

आईना कभी तो मुझे मुझको दिखाए ।
क्यों हर बार एक अजनबी नजर आये हमें ।।

हम चाँद की तरह आज चमके तो है ।
पर क्यों चाँद मे कई दाग नज़र आये हमें ।।

हर बार क्यूँ ये खुदा मैं तेरे दर पे आऊं ।
कभी तू भी तो मेरे घर मिलने आये हमें ।।

हर दोस्त दोस्त नज़र न आये हमें ।
ज़िंदगी ने कुछ यूँ तजुर्बे कराये हमें ।।

-अभिषेक
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Saturday, March 10, 2012

शंख वाणी को बना लो

जब भी देश में परिस्थितियां विपरीत रही है, कवियों और लेखकों ने अपनी कलम से क्रांति का विगुल बजाया है। आजादी मिले हुए कई दशक बीत गए फिर भी देश के हालात बहुत गंभीर है। मैं अपनी इस रचना के जरिये देश के कवियों और लेखकों से आग्रह करता हूँ की वो अपनी लेखनी और आवाज के माधय्म से देश के युवाओं को जगाएं और उनको एकजुट करके इन परिस्थितियों से लड़ने के लिए प्रेरित करें। जय हिंद, जय भारत ।
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शंख वाणी को बना लो कलम को तलवार करलो
हे कवी अब वक़्त आया गद्दारों पर वार करलो


हर युवा अब टूटता है उसका साहस छूटता है
धुंध आँखों में जमाये सहमा-सहमा घूमता है
तूं शब्द अपने फूँक इनमे क्रांति की हुंकार भरदो
शंख वाणी को बना लो कलम को तलवार करलो
हे कवी अब वक़्त आया गद्दारों पर वार करलो


सब जले है अधमरे है सर झुकाए सब खड़े है
आंधिया चिंघाड़ती है दीप सारे बुझ पड़े है
नाव युग की डूबती है कलम को पतवार करलो
शंख वाणी को बना लो कलम को तलवार करलो
हे कवी अब वक़्त आया गद्दारों पर वार करलो


खून निर्दोषों का अब पानी की तरह है बह रहा
ख्वाब शहीदों का है देखो रेत जैसा ढह रहा
तूं दहाड़ कर इन वादियों में जोश का संचार करदो
शंख वाणी को बना लो कलम को तलवार करलो
हे कवी अब वक़्त आया गद्दारों पर वार करलो


शंख वाणी को बना लो कलम को तलवार करलो
हे कवी अब वक़्त आया गद्दारों पर वार करलो  


-अभिषेक 
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Sunday, November 27, 2011

वियोग

वियोग रस का एक गीत:

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तुम धोका ना देना मुझे ओ पिया
मैं खुद हूँ तुम्हारी  तुम्हारा जिया 
मैं सोऊं तो देखूं तुम्हे रातभर
जो जागूं तो सोचूं तुम्हे ही पिया
तुम धोका ना देना मुझे ओ पिया
मैं खुद हूँ तुम्हारी  तुम्हारा जिया

मैं अब तो हवाओं में उड़ने लगी
समुन्दर पे अब मैं तो चलने लगी
सितारों से खुद को सजाती हूँ मैं
कि सूरज का टीका लगाती हूँ मैं
हर रोज जलाऊं मैं तेरा दिया
मैं खुद हूँ तुम्हारी  तुम्हारा जिया
तुम धोका ना देना मुझे ओ  पिया
मैं खुद हूँ तुम्हारी  तुम्हारा जिया   

ज़माने से अब मैं तो डरने लगी
मैं खुद से ही अब बात करने लगी
कहीं यूँ ना अकेले ही मर जाऊं मैं
कहाँ जाऊं और अब किधर जाऊं मैं
संभालो ओ मुझको ओ मोरे पिया
मैं खुद हूँ तुम्हारी  तुम्हारा जिया
तुम धोका ना देना मुझे ओ पिया
मैं खुद हूँ तुम्हारी  तुम्हारा जिया 

तुम्हे क्या पिया याद आती नहीं
इक पल को भी क्या सताती नहीं
मुझसे तो अब दिन ये कटते नहीं
मन मैं जो अरमा है डटते नहीं
मुझे आके बाँहों में भरलो पिया
मैं खुद हूँ तुम्हारी तुम्हारा जिया
तुम धोका ना देना मुझे ओ पिया
मैं खुद हूँ तुम्हारी  तुम्हारा जिया 

-अभिषेक
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Monday, September 19, 2011

बेदर्द ज़माने वाले

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ये लो फिर आ गए बेदर्द ज़माने वाले
बात-बात में मेरे दिल को दुखाने वाले

हर हाँथ मिलाने वाले पे भरोसा न करो
अक्सर दिल नहीं मिलाते हाँथ मिलाने वाले

रात बांकी है और होश भी बांकी है अभी
अभी से कहाँ गए ये मै पिलाने वाले

हर रहनुमा पे तुम ऐतबार ना करना यारो
गुमराह भी कर देते है कुछ राह दिखाने वाले

ये लो फिर आ गए बेदर्द ज़माने वाले
बात-बात में मेरे दिल को दुखाने वाले

-अभिषेक
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Sunday, May 22, 2011

नज़रों से तेरी दूर है तो क्या हुआ

नज़रों से तेरी दूर है तो क्या हुआ

दिल में हरदम हम तेरे रहते तो है

होंठों ने तेरे जो कहा हमने न सुना

दिल ने दिल से जो कहा सुनते तो है

छाये है सावन के जो काले घने बादल

तेरी जुल्फ परेशां के कुछ टुकड़े तो है

जो रंग अपने प्यार के फैलाये है तुमने

वो रोज मेरी सांसों में घुलते तो है

यूँ तो हमारा मिलना एक हसीन ख्वाब है

पर ख्वाब ऐसे रोज हम बुनते तो है

-अभिषेक

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