Meri aawaj

Meri aawaj

Wednesday, October 13, 2010

कुछ गम है जो कभी भुलाये नहीं जाते


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कुछ गम है जो कभी भुलाये नहीं जाते
जाते है अपने छोड़ के पराये नहीं जाते

जो मिले हो मोहब्बत की सक्त राहों में
जख्म ऐसे ज़माने को दिखाए नहीं जाते

जो बयां करे ज़माने को उसकी रुसवाई
अश्क ऐसे पलकों पे लाये नहीं जाते

जो  जख्म उनको दे और दर्द तुमको
तीर ऐसे बातों के चलाये नहीं जाते

जो बिगड़ते है शक की बातों से
रिश्ते ऐसे फिर बनाये नहीं जाते

जो टूटते है टकराके हकीकत से 
ख्वाब ऐसे फिर सजाये नहीं जाते

हीर राँझा तो गुज़ारा हुआ जमाना है 
आशिक ऐसे इस ज़माने में पाए नहीं जाते

-अभिषेक "अनन्त"
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Saturday, October 9, 2010

जगह जगह मौत का सामान बिकता है

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जगह जगह मौत का सामान बिकता है
ये कलयुग है यहाँ इंसान बिकता है

बेटे कहाँ होते है ऐसे आज कल
जिनको माँ बाप में भगवान दिखता है

इंसान इंसान को है क़त्ल कर रहा
इंसान की शक्ल में हैवान दिखता है

आके आपनी आगोस में छुपाले मुझे माँ
देख तेरे बेटे का इमान बिकता है

रुपया पैसा मंदिरों में चड़ा रहे है लोग
कागज के टुकडों में क्या भगवान बिकता है

बहुत दूर आगया तू चन्द सिक्को की खातिर
संभल "अनंत" तेरा अरमान बिकता है

 -अभिषेक "अनन्त"
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Saturday, September 25, 2010

मुहब्बत का मैंने वो मक़ाम पा लिया

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मुहब्बत का मैंने वो मक़ाम पा लिया 
मिले उसको रोशनी, सो खुद को जला लिया

हम खाक है और वो है सितारों का हकदार
मिले उसको बुलंदी, सो खुद को मिटा लिया

जिन्दगी ने तोहफे में दिए कुछ फूल कुछ कांटे  
काँटों पे सोये हम, उसे फूलों पे बिठा लिया

करता भी क्या उस घर का जिस में नहीं है वो 
इसलिए "अनन्त" मैंने घर को जला दिया

-अभिषेक "अनन्त"
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Friday, September 24, 2010

सोच

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वक़्त की तरह मैं चुपचाप चल रहा हूँ
बर्फ का टीला हूँ,  बूंद बूंद गल रहा हूँ

राख है जो दिखती है बाहर से सभी को
अन्दर से अंगार हूँ, अन्दर मैं जल रहा हूँ

क़त्ल करके देख लो कर पाओ जो मुझको
मैं तो एक ख्वाब हूँ, आँखों में पल रहा हूँ

मिट्टी का नहीं हूँ जो मिट जाऊंगा में कल
मैं कल भी रहूँगा, और मैं कल भी रहा हूँ

चले जाते है इंसान सब छोड़ कर के युं
मैं तो उनकी  सोच हूँ, जिन्दा ही रहा हूँ

-अभिषेक 
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Sunday, September 19, 2010

श्री शिव सागर शर्मा जी की कवितायेँ

आज मैं आप लोगों को आज के युग के श्रंगार रस के कवि श्री शिव सागर शर्मा जी की कुछ रचनाएँ सुनाने जा रहा हूँ | मैं जब भी श्री शिव सागर जी को सुनता हूँ तो मुझे श्रंगार रस के श्रेष्ट कवि श्री बिहारी जी की स्मृति आती है जिन्हें में अपने स्कूल के दिनों में पड़ा करता था |
तो यहाँ हैं श्री शिव सागर जी की पहली रचना "ताजमहल" जो बहुत ही प्रसिद्ध हुई है :



वैसे तो कविता का एक एक शब्द मुझे पसंद है पर मेरी सबसे पसंदिता पंक्ति है "चांदनी रात में ताज के फर्श पर यूँ न टहलो ये मीनार हिल जाएगी " 

एक और इनकी रचना जो मुझे बहुत पसंद है आपको सुनवाता हूँ "नैना कज़रा बिना कटार "

 

Thursday, August 19, 2010

तूँ मेरी प्रेम ग़ज़ल है

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तूं मेरे जीवन की है आस, तुझे रक्खूगा दिल के पास 
तूं मेरी प्रेम ग़ज़ल है, तूं मेरी प्रेम ग़ज़ल है

तुम्हे सोचूं, तुम्हे देखू, तुम्हारे गीत में गाऊं
तुम्ही तो हो जीवन का राग, तुम्ही से है ये मेरे दिन रात 
तूं मेरी प्रेम ग़ज़ल है, तूं मेरी प्रेम ग़ज़ल है

जो आज हुए हम दूर, ये है प्यार का एक दस्तूर
कल फिर से होगे पास, हमारा जनम-जनम का साथ 
तूं मेरी प्रेम ग़ज़ल है, तूं मेरी प्रेम ग़ज़ल है

जो आज नहीं मैं पास, तो होती हो तुम क्यों उदास 
करूँगा सात समंदर पार, मिलूँगा तुमसे मेरे दिलदार 
तूं मेरी प्रेम ग़ज़ल है, तूं मेरी प्रेम ग़ज़ल है 

तूं मेरे जीवन की है आस, तुझे रक्खूगा दिल के पास 
तूं मेरी प्रेम ग़ज़ल है, तूं मेरी प्रेम ग़ज़ल है 

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यहाँ आप मेरी ये कविता मेरी आवाज़ मैं सुन सकते है | ये मेरा नया प्रयोग है, आशा है अच्छा लगेगा | 

-अभिषेक