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जब भी मिला वो हमने फासला रक्खा
यूँ जिंदगी से दुश्मनी का सिलसिला रक्खा
लडखडाये कदम जब जिंदगी की राह में
तुझको याद करके हौसला रक्खा
टूट कर टुकड़े-2 हो गया होता
तेरी यादों ने दिल को सिला रक्खा
मुद्दतों नहीं मिला मुझे वो मगर
ख्वाबों में आने-जाने का सिलसिला रक्खा
इन्तजार में तेरे सोए ना उम्र भर
मरने के बाद आखों को खुला रक्खा
-अभिषेक
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Meri aawaj
Tuesday, November 23, 2010
Sunday, October 31, 2010
Wednesday, October 13, 2010
कुछ गम है जो कभी भुलाये नहीं जाते
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कुछ गम है जो कभी भुलाये नहीं जाते
कुछ गम है जो कभी भुलाये नहीं जाते
जाते है अपने छोड़ के पराये नहीं जाते
जो मिले हो मोहब्बत की सक्त राहों में
जो मिले हो मोहब्बत की सक्त राहों में
जख्म ऐसे ज़माने को दिखाए नहीं जाते
जो बयां करे ज़माने को उसकी रुसवाई
जो बयां करे ज़माने को उसकी रुसवाई
अश्क ऐसे पलकों पे लाये नहीं जाते
जो जख्म उनको दे और दर्द तुमको
तीर ऐसे बातों के चलाये नहीं जाते
जो बिगड़ते है शक की बातों से
रिश्ते ऐसे फिर बनाये नहीं जाते
जो टूटते है टकराके हकीकत से
ख्वाब ऐसे फिर सजाये नहीं जाते
हीर राँझा तो गुज़ारा हुआ जमाना है
जो जख्म उनको दे और दर्द तुमको
तीर ऐसे बातों के चलाये नहीं जाते
जो बिगड़ते है शक की बातों से
रिश्ते ऐसे फिर बनाये नहीं जाते
जो टूटते है टकराके हकीकत से
ख्वाब ऐसे फिर सजाये नहीं जाते
हीर राँझा तो गुज़ारा हुआ जमाना है
आशिक ऐसे इस ज़माने में पाए नहीं जाते
-अभिषेक "अनन्त"
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-अभिषेक "अनन्त"
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Saturday, October 9, 2010
जगह जगह मौत का सामान बिकता है
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जगह जगह मौत का सामान बिकता है
ये कलयुग है यहाँ इंसान बिकता है
बेटे कहाँ होते है ऐसे आज कल
जिनको माँ बाप में भगवान दिखता है
इंसान इंसान को है क़त्ल कर रहा
इंसान की शक्ल में हैवान दिखता है
आके आपनी आगोस में छुपाले मुझे माँ
देख तेरे बेटे का इमान बिकता है
रुपया पैसा मंदिरों में चड़ा रहे है लोग
कागज के टुकडों में क्या भगवान बिकता है
बहुत दूर आगया तू चन्द सिक्को की खातिर
संभल "अनंत" तेरा अरमान बिकता है
-अभिषेक "अनन्त"
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जगह जगह मौत का सामान बिकता है
ये कलयुग है यहाँ इंसान बिकता है
बेटे कहाँ होते है ऐसे आज कल
जिनको माँ बाप में भगवान दिखता है
इंसान इंसान को है क़त्ल कर रहा
इंसान की शक्ल में हैवान दिखता है
आके आपनी आगोस में छुपाले मुझे माँ
देख तेरे बेटे का इमान बिकता है
रुपया पैसा मंदिरों में चड़ा रहे है लोग
कागज के टुकडों में क्या भगवान बिकता है
बहुत दूर आगया तू चन्द सिक्को की खातिर
संभल "अनंत" तेरा अरमान बिकता है
-अभिषेक "अनन्त"
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Saturday, September 25, 2010
मुहब्बत का मैंने वो मक़ाम पा लिया
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मुहब्बत का मैंने वो मक़ाम पा लिया
मिले उसको रोशनी, सो खुद को जला लिया
हम खाक है और वो है सितारों का हकदार
मिले उसको बुलंदी, सो खुद को मिटा लिया
जिन्दगी ने तोहफे में दिए कुछ फूल कुछ कांटे
काँटों पे सोये हम, उसे फूलों पे बिठा लिया
करता भी क्या उस घर का जिस में नहीं है वो
इसलिए "अनन्त" मैंने घर को जला दिया
-अभिषेक "अनन्त"
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मुहब्बत का मैंने वो मक़ाम पा लिया
मिले उसको रोशनी, सो खुद को जला लिया
हम खाक है और वो है सितारों का हकदार
मिले उसको बुलंदी, सो खुद को मिटा लिया
जिन्दगी ने तोहफे में दिए कुछ फूल कुछ कांटे
काँटों पे सोये हम, उसे फूलों पे बिठा लिया
करता भी क्या उस घर का जिस में नहीं है वो
इसलिए "अनन्त" मैंने घर को जला दिया
-अभिषेक "अनन्त"
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Friday, September 24, 2010
सोच
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वक़्त की तरह मैं चुपचाप चल रहा हूँ
बर्फ का टीला हूँ, बूंद बूंद गल रहा हूँ
राख है जो दिखती है बाहर से सभी को
अन्दर से अंगार हूँ, अन्दर मैं जल रहा हूँ
क़त्ल करके देख लो कर पाओ जो मुझको
मैं तो एक ख्वाब हूँ, आँखों में पल रहा हूँ
मिट्टी का नहीं हूँ जो मिट जाऊंगा में कल
मैं कल भी रहूँगा, और मैं कल भी रहा हूँ
चले जाते है इंसान सब छोड़ कर के युं
मैं तो उनकी सोच हूँ, जिन्दा ही रहा हूँ
-अभिषेक
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वक़्त की तरह मैं चुपचाप चल रहा हूँ
बर्फ का टीला हूँ, बूंद बूंद गल रहा हूँ
राख है जो दिखती है बाहर से सभी को
अन्दर से अंगार हूँ, अन्दर मैं जल रहा हूँ
क़त्ल करके देख लो कर पाओ जो मुझको
मैं तो एक ख्वाब हूँ, आँखों में पल रहा हूँ
मिट्टी का नहीं हूँ जो मिट जाऊंगा में कल
मैं कल भी रहूँगा, और मैं कल भी रहा हूँ
चले जाते है इंसान सब छोड़ कर के युं
मैं तो उनकी सोच हूँ, जिन्दा ही रहा हूँ
-अभिषेक
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Sunday, September 19, 2010
श्री शिव सागर शर्मा जी की कवितायेँ
आज मैं आप लोगों को आज के युग के श्रंगार रस के कवि श्री शिव सागर शर्मा जी की कुछ रचनाएँ सुनाने जा रहा हूँ | मैं जब भी श्री शिव सागर जी को सुनता हूँ तो मुझे श्रंगार रस के श्रेष्ट कवि श्री बिहारी जी की स्मृति आती है जिन्हें में अपने स्कूल के दिनों में पड़ा करता था |
तो यहाँ हैं श्री शिव सागर जी की पहली रचना "ताजमहल" जो बहुत ही प्रसिद्ध हुई है :
वैसे तो कविता का एक एक शब्द मुझे पसंद है पर मेरी सबसे पसंदिता पंक्ति है "चांदनी रात में ताज के फर्श पर यूँ न टहलो ये मीनार हिल जाएगी "
एक और इनकी रचना जो मुझे बहुत पसंद है आपको सुनवाता हूँ "नैना कज़रा बिना कटार "
तो यहाँ हैं श्री शिव सागर जी की पहली रचना "ताजमहल" जो बहुत ही प्रसिद्ध हुई है :
वैसे तो कविता का एक एक शब्द मुझे पसंद है पर मेरी सबसे पसंदिता पंक्ति है "चांदनी रात में ताज के फर्श पर यूँ न टहलो ये मीनार हिल जाएगी "
एक और इनकी रचना जो मुझे बहुत पसंद है आपको सुनवाता हूँ "नैना कज़रा बिना कटार "
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